लाहिड़ी महाशय

Lahiri Mahasaya great yogi guru of Swami Sri Yukteswar

लाहिड़ी महाशय का जन्म 30 सितंबर, 1828 को भारत में बंगाल के घुरनी गाँव में हुआ था। तैंतीस वर्ष की आयु में, रानीखेत के पास हिमालय की तलहटी में एक दिन घूमने के दौरान, वह अपने गुरु महावतार बाबाजी से मिले। यह उन दोनों का दिव्य पुनर्मिलन था। यह दोनों बहुत से पूर्व जन्मों में भी साथ रह चुके थे। आशीर्वाद के जागृति उत्पन्न कर देने वाले एक स्पर्श से लाहिड़ी महाशय ईश्वरीय बोध की आध्यात्मिक आभा में डूब गए जो सर्वदा उनके साथ रही।

महावतार बाबाजी ने उन्हें क्रियायोग के विज्ञान में दीक्षा दी और सभी शुद्ध और सच्चे साधकों को इस पवित्र तकनीक को प्रदान करने का निर्देश दिया। इस महान उद्देश्य की पूर्ती हेतु लाहिड़ी महाशय अपने घर बनारस लौट आए। समकालीन युग में लुप्त हुए क्रियायोग विज्ञान की शिक्षा प्रदान करने वाले प्रथम गुरु के रूप में वह उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आधुनिक भारत मे अत्यंत प्रभावशाली मौलिक (बीजरूपी) योग के पुनर्जागरण में मौलिक भूमिका का निर्वहन करने वाले गुरु के रूप में निरंतर प्रसिद्ध हैं।

 

परमहंस योगानन्दजी ने “योगी कथामृत” में लिखा है : “जिस प्रकार फूलों की सुगंध को दबाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार यद्यपि लाहिड़ी महाशय शांतिपूर्वक एक आदर्श गृहस्थ की भांति रह रहे थे, किन्तु अपनी सहज महिमा, कीर्ति को छिपा नहीं पाए। भारत के हर भाग से भक्त-भ्रमर संसार से विमुक्त गुरु से दिव्य अमृत प्राप्त करने हेतु उनके पास आने लगे।…महान गृहस्थ-गुरु का सामंजस्यपूर्ण संतुलित जीवन हजारों पुरुषों और महिलाओं की प्रेरणा बन गया।”

लाहिड़ी महाशय ने योग के उच्चतम आदर्शों का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जैसे कि “अल्प स्व” का ईश्वर में समाहित हो जाना। उन्हें योगावतार या योग के अवतार के रूप में माना जाता है।

परमहंस योगानन्दजी के माता-पिता लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, और जब वह माँ की गोद में ही थे, तब उनकी माँ उन्हें अपने गुरु के घर ले गईं। शिशु को आशीर्वाद देते हुए, लाहिड़ी महाशय ने कहा, “छोटी माँ, तुम्हारा बेटा एक योगी होगा। एक आध्यात्मिक इंजन की भांति वह अनेकों आत्माओं को परमेश्वर के राज्य में ले जाएगा।”

लाहिड़ी महाशय ने अपने जीवनकाल में कोई संस्था स्थापित नहीं की, किन्तु यह भविष्यवाणी की कि : “पश्चिम में योग के प्रति गहरी रुचि जागृत होने के कारण, मेरे संसार से विदा होने के लगभग 50 वर्ष पश्चात् मेरा जीवन परिचय लिखा जाएगा। योग का सन्देश पूरे विश्व में फैल जाएगा। यह मनुष्यों में भाईचारे की भावना स्थापित करने में सहायक होगा : सबका पिता एक ही है, इस प्रत्यक्ष धारणा पर मानवता की एकता स्थापित होगी।”

लाहिड़ी महाशय ने 26 सितंबर, 1895 को बनारस में महासमाधि में प्रवेश किया। पचास वर्ष पश्चात् उनकी भविष्यवाणी तब पूरी हुई जब पश्चिम में योग में बढ़ती हुई रुचि ने परमहंस योगानन्दजी को अमेरिका में ‘योगी कथामृत’ लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें लाहिड़ी महाशय का सुंदर परिचय दिया गया है।

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