(जनवरी 31, 1914 – नवम्बर 30, 2010)

श्रद्धांजलि

श्री श्री दया माता के देहावसान के बाद, ई-मेल, पत्रों, तथा फोन द्वारा विश्व भर से शुभचिंतकों एवं मित्रों के हज़ारों सन्देश हमारे अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय में आये। कुछ भक्तों ने अपने संस्मरण में माँ के जीवनकाल के दौरान उनसे हुई भेंटों से प्राप्त प्रेरणा का उल्लेख किया। परन्तु इनमें एक बड़ी संख्या में वे भक्त भी थे जो व्यक्तिगत रूप से तो उनसे कभी नहीं मिल पाये थे, लेकिन फिर भी आन्तरिक रूप से उनके सान्निध्य का अनुभव करते वे उनके साथ एक अंतरंग सम्बन्ध महसूस करते थे।

यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे उद्धरण इस प्रिय आध्यात्मिक विभूति के साथ हुए लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों की विविधता की झलक प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इन सभी में निशर्त प्रेम एवं करुणा की एक समान अभिव्यक्ति मिलती है जो श्री श्री दया माता के स्वरूप के तत्त्व थे।

“एसआरएफ़/वाईएसएस तथा ईश्वर के प्रति निष्ठा और आनन्द के साथ की गयी तुम्हारी बुद्धिमत्ता पूर्ण सेवा मुझे अत्यन्त प्रसन्न करती रही है। मेरी प्रार्थना है कि तुम्हें जगन्नमाता में अपने स्वरूप का बोध हो, और तुम अपने जीवन के उदाहरण द्वारा दूसरों को ईश्वर तक लाने के एकमेव उद्देश्य से, अपने दिव्य मातृत्व भाव से सभी को प्रेरित करो। अनन्त आशीर्वाद।”

परमहंस योगानन्द

महामहिम श्री एम. हामिद अन्सारी, भारत के उपराष्ट्रपति: “योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की संघमाता एवं अध्यक्षा, श्री श्री दया माता, के निधन पर कृपया मेरा शोक स्वीकार करें।

“संस्थापक परमहंस योगानन्दजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी के रूप में श्री दया माता ने पचपन वर्षों तक उनके उद्देश्यों एवं आदर्शों का प्रवर्तन किया। दया माताजी ने विश्व के धर्मों के बीच आधारभूत एकता एवं सामंजस्यता का संवर्द्धन करने में, सभी व्यक्तियों में भ्रातृत्व की भावना का संचार करने में, तथा मानवजाति को अपना ही बृहद् स्वरूप मानकर उसकी सेवा करने में एक अहम भूमिका निभायी।

“आज के संघर्ष-पीड़ित संसार में ये आदर्श बहुत सार्थक हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप इन सद् आदशों को मूर्त रूप देने में प्रयासरत रहेगा तथा मानवजाति को सन्मार्ग पर चलते रहने और सतकार्य करने के लिये प्रेरित करता रहेगा।”

महामहिम श्री एम. ओ. एच. फ़ारूक, झारखण्ड राज्य के राज्यपाल: “परमहंस योगानन्दजी की अग्रगण्य शिष्या, श्री दया माता, के दुःखद निधन पर मैं खेद व्यक्त करता हूँ।… श्री दया माता प्रेम एवं करुणा तथा भारतीय संस्कृति के अन्य समयातीत मूल्यों का मूर्तरूप थीं।… मैं हृदय की गहराई से अपना शोक संदेश प्रेषित करता हूँ तथा ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के सदस्यों को यह अपूरणीय क्षति सहन करने की शक्ति प्रदान करें।”

माननीय श्री अर्जुन मुण्डा, झारखण्ड राज्य के मुख्यमन्त्री: “यह हार्दिक दुःख का विषय है कि श्री श्री दया माता अब हमारे बीच नहीं रहीं। यह भारतीय आध्यात्मिक समाज के लिये एक अपूरणीय क्षति है। परन्तु कहा जाता है कि संतों का देहान्त नहीं होता, वे स्वयं ही शरीर का त्याग कर ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। ऐसी आत्माओं का अस्तित्व शरीर की लघु सीमा से परे, पूरे अंतरिक्ष तक विस्तृत हो जाता है।

“अपने जीवन काल में भारतीय अध्यात्म को पूर्णतया आत्मसात् कर विश्व पटल पर पूरब और पश्चिम की विचारधाराओं का अद्भुत मेल प्रस्तुत कर श्री श्री दया माता ने स्पष्ट कर दिया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ईश्वर की रचना है और सारी मानवजाति उसी एक की संतान है।

“मैं गोलोकवासी आत्मा के प्रति अपनी भावभीनी भावांजलि अर्पित करता हूँ और आशा करता हूँ कि उनका अलौकिक प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव हम सबके साथ रहेगा।”

स्वामी सत्यसंगानन्द, रिखियापीठ: “कृपया मेरी विनीत भावांजलि स्वीकार करें, श्री दया माताजी अपने गुरुदेव के मिशन की प्रेरणाप्रद एवं समर्पित शिष्या थीं। अब जबकि वे स्थूल शरीर की बेड़ियों से मुक्त हैं, और चूँकि उनकी दिव्य उपस्थिति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जायेगी, अतः मुझे पूरा विश्वास है कि उनका निःशर्त प्रेम अनेकों के जीवन को उसी प्रकार आशीर्वाद प्रदान करता रहेगा। ऊँ-तत्-सत्।”

स्वामी विमलानन्द, अध्यक्ष, डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी, ऋषिकेश: “हम सबकी प्रिय एवं श्रद्धेय दया माताजी के देहावसान पर हमारा तुच्छ मन तो केवल शोक ही अनुभव करेगा। परन्तु वास्तविकता यह है कि वे उस परब्रह्म परमेश्वर में लीन हो गयी हैं। महात्माओं महापुरुषों की मृत्यु नहीं हुआ करती। वे हमारे अंतर् द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हुए शाश्वत रूप से हमारे बीच रहते हैं। अपना नश्वर शरीर त्याग दिव्य माँ तो वास्तव में शरीर के परिसीमनों पर विजय पाकर सर्वव्यापी हो गयी हैं।…

“माँ की उपस्थिति अनेकानेक साधकों के लिये प्रेरणा का एक बहुत बड़ा स्रोत थी। उनका प्रेम और उनकी करुणा दुःखी मन लेकर आये कई लोगों के लिये सांत्वना का रूप ले लेती थी। उनकी अनुकम्पा ऐसे व्यक्तियों को आशा की किरण प्रदान करती थी जो बिल्कुल हताश होकर आते थे। माँ ने शरीर त्याग दिया है, तो अब वे भक्तों को मार्गदर्शन और प्रेरणा कैसे देंगी? चिन्ता की बात नहीं है! अब जबकि माँ अपने भौतिक परिसीमनों से परे चली गयी हैं, तो उनकी उपस्थिति पूरे विश्व में हर समय अनुभव की जा सकती है। सत्यनिष्ठ भाव से ईश्वर की खोज करने वाले सभी व्यक्तियों में वे प्रेरणा, करुणा, तथा आशा का संचार करती रहेंगी।

“मेरी प्रार्थना है कि ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त करने के हमारे प्रयत्न में माँ के सबसे चुनिन्दा आशीष हम सभी को सदा मिलते रहें।”

स्वामी वेंकटेशानन्द (डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी के एक सन्त)

“इस जगत से प्रयाण करने से पूर्व (परमहंस योगानन्दजी) ने कहा था, ‘मेरे जाने के बाद केवल प्रेम ही मेरा स्थान ले सकता है।’ उनके जाने के बाद, दया माताजी में साकार हुए प्रेम ने उनका स्थान लिया है।… समर्पित शिष्य गुरु के कार्य को श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ाता है, केवल उनके वचनों को दोहराकर नहीं, बल्कि उनके जैसा बन कर।

श्री के॰ कृष्नन नायर, महात्मा गांधी जी के शिष्य:

श्री श्री दया माताजी से उस भेंट का आनन्द अभी तक मेरे हृदय में तरो-ताज़ा है। वे अद्भुत प्रेम को निस्सारित करती हैं: यही उनका संदेश है।”

महामहिम जगतगुरु श्री भारती तीर्थ, पुरी के शंकराचार्य, 1958 में एसआरएफ़ मुख्यालय पर श्री दया माताजी के साथ अपनी यात्रा के पश्चात, दी गयी टिप्पणी:

“मैंने एसआरएफ़ में उच्चतम आध्यात्मिकता, सेवा, एवं प्रेम को पाया है। यहाँ के प्रतिनिधि न केवल उन सिद्धान्तों का उपदेश ही देते हैं, अपितु वे उनके अनुसार जीवन भी जीते हैं।”

डा. बिनय रंजन सेन, अमेरिका में भारत के भूतपूर्व राजदूत एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की कृषि एवं खाद्य संस्था के महा निदेशक

“परमहंस योगानन्दजी की विरासत उनकी संतवत शिष्या श्री दया माताजी के अतिरिक्त किसी अन्य में इतनी अधिक दीप्तता के साथ नहीं चमकती, जिन्हें उन्होंने अपने प्रयाण के पश्चात अपने पदचिन्हों  पर चलकर इस कार्य को आगे बढ़ाने हेतु तैयार किया था।… मेरी तरह ही, अन्य वे लोग जिन्हें परमहंसजी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, दया माताजी में दिव्य प्रेम तथा दया की उसी भावना को परावर्तित होते पाते हैं, जिसने मुझे लगभग चालीस वर्ष पूर्व सेल्फ़-रियलाइज़ेशन केंद्र की अपनी प्रथम यात्रा के दौरान प्रभावित किया था।”

श्री नानी ए॰पालकीवाला, अमेरिका में भारत के भूतपूर्व राजदूत:

“श्री दया माताजी प्रेम, तथा दया, तथा भारतीय संस्कृति के अन्य कालातीत गुणों की जीवन्त मूर्ति हैं।… उनके प्रवचन धर्म सिद्धान्तों पर नीरस पांडित्यपूर्ण व्याख्यान नहीं हैं, अपितु वे तो ईश्वर के प्रति उनके भावपूर्ण निजी उद्ग़ार हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि दया माताजी को सृष्टिकर्ता के दिव्य दर्शनों का अनुभव प्राप्त है।”

सी॰वी॰नरसिम्हन, संयुक्त राष्ट्र संघ के अवर महासचिव :

“मुझे श्री दया माताजी से अनेकों बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।… उनकी उपस्थिति में रहने वाला कोई भी व्यक्ति, उनसे नि:सृत होने वाली आध्यात्मिक शान्ति तथा निर्मलता के प्रभामण्डल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।… श्री दया माताजी का सन्देश, संशय तथा अविश्वास के इस युग में अत्यधिक महत्वपूर्ण तथा प्रासंगिक है।… यह मानव जाति की एकता का ही उदघोष नहीं, अपितु मनुष्य की ईश्वर के साथ एकरूपता का भी उदघोष है।”

स्वामी श्यामानन्द गिरी, 1971 में अपनी देह त्याग तक एसआरएफ़/वायएसएस के निदेशक मण्डल के सदस्य:

“सन 1958 में जब मैं पूजनीय दया माताजी से प्रथम बार मिला था, तब मैं स्तम्भित रह गया था कि कैसे एक पश्चिमी व्यक्ति भारत के सन्तों जैसा हो सकता है? तभी मैंने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन की शिक्षाओं के सामर्थ्य को समझा। उनका ईश-बोध किसी संयोगवश प्रकट नहीं हुआ था। गुरुदेव की शिक्षाओं के अनुसरण के अपने प्रयासों द्वारा उन्होंने स्वयं को परमेश्वर के साथ समस्वरित कर लिया था, तथा इस प्रकार परमेश्वर का ज्ञान उनमें प्रवाहित होता था।”

आनन्दमयी माँ, आधुनिक भारत के महानतम सन्तों में से एक, द्वारा श्री दया माताजी के प्रति एक टिप्पणी, उनकी एक भारत यात्रा के दौरान आनन्दमयी माँ के आश्रम की यात्रा पर:

“जिस भाव को मैंने तुम्हारे गुरु में देखा था, उसी भाव को मैं तुम में भी देख रही हूँ।”

गुरुदेव के भाई की पौत्री श्रीमति मुक्तमाला मित्र एवं परिवार, कोलकाताः “प्रिय दया माताजी के निधन पर मुझे और मेरे परिवार को अत्यन्त दुःख हुआ। यह हमारा सौभाग्य है कि हमें उनके दिव्य प्रेम एवं आशीर्वाद के आनन्दलाभ का, उनके मार्गदर्शन का, तथा निःशर्त प्रेम पर उनके उन अद्भुत लेखों को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ जिन्होंने आजकल के इस उथल-पुथल भरे दौर में हमें अपने सांसारिक जीवन की नाना परीक्षाओं एवं उतार-चढ़ावों का सामना करने में संबल दिया।… उनके गुज़र जाने से हमें ऐसा लग रहा है जैसे सहसा एक ऐसा विशाल वटवृक्ष हम से छीन लिया गया हो जिसकी छत्रछाया तले हम अब तक जी रहे थे। दिव्य सुन्दरता और प्रेम से भरा उनका वह पत्र मुझे आज भी याद है जो उन्होंने मेरे विवाह के अवसर पर हमें भेजा था। किन्तु, हम जानते हैं कि आत्मा अमर है, दिव्य प्रेम अमर है, और इसलिये हम जानते हैं कि उन्होंने तो बस अपने देह रूपी वस्त्रों का त्याग किया है, और उनकी दिव्य उपस्थिति एवं प्रेम सदैव हमारे साथ रहेंगे।”

Time पत्रिका:

“इतिहास में ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों के अवशेष बिखरे पड़े हैं जो जले और बुझ गए एक करिश्माई नेता द्वारा जलायी गयीं श्रद्धा की अल्पक़ालीन मोमबत्तियाँ जो उसकी मृत्यु के थोड़े समयबाद ही बुझ गयीं।… सेल्फ़ रियलाईज़ेशन फ़ेलोशिप (योगदा सत्संग सोसाइटी आफ़ इण्डिया), की ज्योति की भी, 1952 में इसके संस्थापक परमहंस योगानन्दजी की मृत्यु के पश्चात, तड़तड़ाकर बुझ जाने की सम्भावना प्रतीत होती थी। परन्तु ऐसा न होकर यह संस्था अत्यधिक फूली – फली है।… 1955 से यह संस्था, मिस फ़े राइट, जिन्हें फ़ेलोशिप में दया माता के नाम से जाना जाता है, के नेतृत्व में निर्देशित हुई।”

डेन थरेप, लॉस एनज़िलिस टाइम्ज़ के धार्मिक लेखों के सम्पादक:

“मैंने दया माताजी का साक्षात्कार लिया और अनेकों कारणों से मैं उनसे अत्यधिक प्रभावित हुआ: उनकी बुद्धिमत्ता, उनकी निष्ठा, उनकी सच्चाई मैं सदैव लोगों का मूल्याँकन उनकी सत्यवादिता से करता हूँ और उनका धार्मिक विषयों पर उदार दृष्टिकोण।… मेरे लिए एक पर्वत की चोटी सदैव अपनी स्वयं की चमक, अपनी स्वयं की प्रदीप्तता, उत्पन्न करती है। और मेरे लिए, माउण्ट वाशिंगटन के शिखर ने उस विशेष चमक का मूर्तरूप दया माताजी के व्यक्तित्व के रूप में किया है।…मैं अपनी चिर-स्थाई श्रद्धा, सम्मान तथा प्रेम तथा इस बात की स्वीकारोक्ति भी भेजता हूँ कि उनका कार्य अद्वितीय है तथा समान रूप से वे भी उसे परिपूर्ण करने हेतु अद्वितीय रूप से सक्षम हैं।”

चैरिटी की एक कैथोलिक सन्यासिनी :

“एक धार्मिक संस्था की सदस्य होने के नाते, मेरे लिये दया माताजी, परमेश्वर की सेवा में समर्पित जीवन का एक ज्वलंत उदाहरण हैं।…उनके लिये न तो कोई कैथोलिक है, न प्राटेस्टंट और न ही कोई हिन्दू, बस परमपिता परमेश्वर की एक मात्र सन्तान। तथा वे प्रत्येक का शिष्टतापूर्वक स्वागत करतीं थीं तथा उनके लिये अपने हृदय में जगह भी रखतीं थीं। मैं, एक कैथोलिक संन्यासिनी ने उनकी दयालुता, उनकी हितकारिता तथा उनके प्रोत्साहन को अत्यधिक अनुभव किया है। मुझे सदैव ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि मैं उन्हीं की किसी में से एक हूँ। मेरे लिए वे सदैव एक आदर्श रहेंगी, जिसे मैं अपने आध्यात्मिक जीवन में खोजना चाह रही हूँ।… वे परमेश्वर को व्यक्त करतीं थीं।”

प्रिसचिला प्रेसले:

“श्री दया माताजी मृदुभाषी एवं सहज स्वाभाविक थीं, एक ऐसा व्यक्तित्व जो निश्चित रूप से स्वयं के अंत: करण में शान्ति पूर्ण था। एलविस तुरन्त उनसे मिलने के बाद उन्हें पसंद करने लगे थे। इस प्रकार, एलविस तथा दया माताजी के बीच अनवरत वार्तालाप शुरू हो गया, जिसने उनके जीवन को गम्भीरतापूर्वक प्रभावित किया था।…उनके मन में इस महिला के प्रति महान श्रद्धा थी।”

संगीतकार, जॉर्ज हैरिसन :

“एक देवदूत का सार-तत्व क्या होता है? यही, एक ऐसा व्यक्ति जो देवदूत सदृश हो, ऐसा जिसके अंत: करण में वैसी ही पवित्रता हो। दया माताजी जैसा व्यक्तित्व, जिनके अंत:करण में जो विद्यमान था उसे मैं देवदूती गुण ही कहूँगा।”

डा. एस॰डी॰ जोशी, लेखक, तकनिशीयन, तथा वालचंद इंडसट्रीज के भूतपूर्व मुख्य प्रबन्धक:

“1967 में, संघमाता, दयामाता जी ने भारत का दौरा किया वह घटना जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था।… उनकी उपस्थिति के संसर्ग़ में मैंने उनमें सर्वजनीन माँ को देखा दिव्य ऊर्जा, मातृत्व प्रेम तथा दया का मूर्तरूप।… अपने प्रभामण्डल, परहित इच्छा, तथा दया से भरपूर दया माताजी ने मेरी गहन श्रद्धा को आकर्षित कर लिया।”

आदरणीय श्री प्रेम अंजलि, पीएच.डी., कार्यपालक निदेशक, सच्चिदानन्द आश्रम-योगाविल, वर्जिनिया, अमेरिका: “प्रिय एवं पूज्य श्री दया माताजी के देहावसान का समाचार अभी-अभी प्राप्त हुआ। सच्चिदानन्द आश्रम-योगाविल के न्यासियों (Trustees) तथा समस्त इंटीग्रल योगा (Integral Yoga) संगठन एवं संघ की ओर से हम आपको तथा सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के सदस्यों को अपनी हार्दिक प्रार्थनायें भेजते हैं। श्री दया माताजी की स्मृति एवं उनके सम्मान में हम सच्चिदानन्द आश्रम-योगाविल में एक विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन कर रहे हैं।

“उस महान् आत्मा को हम श्रद्धांजलि अर्पित करते रहेंगे जिसने गुरु एवं ईश्वर की सेवा का, तथा ईश्वर प्रदत्त अधिकार के साथ आत्माओं का आध्यात्मिक उत्थान करने का उदाहरण स्थापित किया। श्री दया माताजी द्वारा की गई मानव-सेवा का दायरा अत्यन्त विशाल था जिसमें अपने पूज्य गुरु परमंहस योगानन्दजी के अनुयायियों एवं उनके संगठन का प्रेमपूर्वक पथ-प्रदर्शन करना भी शामिल था।

“हमारी प्रार्थना और हृदयानुभूत भावना इस समय, और आगे भी सदा आपके साथ रहेंगे। ईश्वर करें कि आप अपने दिव्य गुरु की गहनतम इच्छाओं तथा सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के सपने को पूरा करने के लिये उनके महान् सन्देश के अग्रदूत बने रहें। हमारी प्रार्थना है कि आप अपना जीवन अपने दिव्य गुरु को अर्पित करते रहें तथा श्री दया माताजी द्वारा जीवन पर्यन्त दिये गये भक्ति तथा समर्पण के उदाहरण से निरन्तर प्रेरणा लेते रहें।”

विला मॅरियाना ध्यान समूह, ब्राज़ील: “अपने इस छोटे-से समूह में हम दया माताजी को जगन्माता के साथ हमें जोड़ने वाली एक कड़ी के रूप में प्यार करते हैं।… यह समाचार हमारे लिये बहुत बड़ा आघात था। हमने उनकी याद में एक ध्यान-सभा आयोजित की। हम सभी की आँखों में आँसू थे और कुछ खो देने का अहसास था, लेकिन हम सबको एक ही जैसा अनुभव हुआ। ऐसा महसूस हुआ मानो दया माताजी ने हमें दुःखी नहीं रहने दिया। शान्ति और आनन्द का भाव वहाँ उपस्थित सभी के हृदयों को भेदने लगा (ऐसा कोई नहीं था जिसने इसे अनुभव न किया हो)। और हम सभी को एक ज़िम्मेदारी का भी अहसास हुआ। उन्होंने एक आदर्श शिष्या का जीवन बिताया था।

अब यह हमारा कर्तव्य है कि हम भी वही करने का ध्येय अपनायें। मुझे दुःख तो था, लेकिन उन्होंने मुझे दुःखी रहने नहीं दिया। उनकी उपस्थिति अब पहले से भी अधिक प्रबल है।”

डी. जेड., कैलिफ़ोर्निया: “हमारी प्रिय दया माताजी के निधन के बाद मैंने यह महसूस किया है, और मुझे लगता है अन्य कई भक्तों ने भी महसूस किया होगा, कि हमें गहनतर ध्यान तथा प्रेमपूर्ण अंतर्ज्ञान का एक ऐसा गूढ़ आशीर्वाद मिला है जो अंतर् में प्रत्यक्ष सुनाई देने वाली उनकी मृदुल वाणी की फुसफुसाहट के रूप में हम तक आता है। मैंने कभी-भी इतना अगाध प्रेम अनुभव नहीं किया जितना कि आनन्द भरी स्मृति-सभा के बाद के इन दिनों में किया है। और इतना तो मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि महाप्रयाण के बाद भी हमारी प्यारी माँ हमें उसी तरह आशीष दे रही हैं, और हम कभी-भी पहले जैसे नहीं रहेंगे।”

अनाम पत्र, फ़िनलैंड: “उनके निधन के बाद हम यह अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं कि उन्होंने इतने वर्षों तक न केवल हम सब को वरन् पूरे विश्व को कितनी अथक और महत्त्वपूर्ण सेवा प्रदान की थी।”

एफ़. बी., ब्राज़ील: “केवल हम भक्तों के लिये ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व के लिये यह एक भारी क्षति है क्योंकि एक महान् सन्त और ईश्वर-प्रेमी अब इस दुनिया में नहीं रहा। दया माताजी का जीवन, आदर्श शिष्यत्व का उनका सन्देश एवं उदाहरण, हमें कई दशकों से प्रेरणा देता रहा है। जहाँ तक मेरा सवाल है, तो मैं कह सकता हूँ कि मैंने उनकी पुस्तकें इतनी बार पढ़ी हैं और उनकी टेप इतनी बार सुनी हैं कि उनकी आवाज़ मेरे मन में स्थायी रूप से बस गयी है और उनके शब्द मेरे हृदय में हमेशा के लिये अंकित हो चुके हैं। मेरी साधना में वे प्रेरणा का गहन स्रोत हैं और सदैव रहेंगी। मैं जगन्माता को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने दया माताजी को इतने लम्बे समय तक हमारे साथ रहने दिया। यद्यपि इस क्षति से मैं दुःखी अवश्य हूँ, पर दया माताजी के लिये मैं खुश हूँ क्योंकि वे अब जगन्माता के अनन्त आनन्द-सागर में मुक्त हैं। मुझे विश्वास है कि गुरुदेव के साथ अब वे जहाँ भी हैं, वहाँ से वे हमें मार्गदर्शन देती रहेंगी तथा हमारे लिये प्रार्थना करती रहेंगी।”

ए. आर., इटली: “मैंने उन्हें कई बार पत्र लिखे और हम में से प्रत्येक के प्रति उनकी व्यक्तिगत रुचि पर मैं आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पाता था। उनके उत्तर हमेशा प्रेम, ज्ञान, तथा व्यावहारिक सुझाव से पूर्ण होते थे। उन्होंने कहा कि साधना को धैर्य और प्रेम से करें जैसे कि वे स्वयं किया करती थीं।

“वे जगन्माता के प्रेम की प्रकट अभिव्यक्ति थीं—प्रेम का मूर्तरूप, हमारे गुरु के प्रेम का, और ईश्वर के प्रेम का मूर्तरूप।”

एस. बी. जॉर्जिया: “परमहंस योगानन्दजी ने कहा था ‘इस संसार से मेरे जाने के बाद केवल प्रेम ही मेरा स्थान ले सकता है।’ कैवल्यदर्शनम् (The Holy Science) से हमें यह पता चलता है कि ईश्वर-प्रेम ही पूरे ब्रह्माण्ड में वह सर्वाधिक शक्तिशाली आकर्षण बल है जो सृष्टि को सदा उस दिव्य स्रष्टा की ओर वापस खींचता रहता है। इस संसार में कोई भी ‘ प्रेम दे नहीं सकता ‘; हम तो बस खुद को शुद्ध कर सकते हैं ताकि दिव्य प्रेम हम में बह सके और हमारे माध्यम से विकीर्ण हो सके। श्री दया माता ने भी यही किया—बहुत सुन्दरता से और पूरी तरह से। जब वे सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के वार्षिक अधिवेशन में व्याख्यान देती थीं, तो उनके प्रेम के स्पन्दन से बॉनावॅन्चर होटल का कैलिफ़ोर्निया बॉलरूम पूरी तरह ओतप्रोत हो जाया करता, और हर व्यक्ति इसे अनुभूत कर पाता था, चाहे वह योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़ रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का भक्त हो या न हो। अहम बात यह है कि उनका प्रेम उनकी सच्ची और निर्मल विनम्रता से अलंकृत और सुगन्धित रहता था। पूरी मानवजाति के इतिहास में, मैं कोई दूसरा उदाहरण नहीं जानता जहाँ किसी बड़े संगठन के नेता ने साठ वर्षों में एक बार भी संगठन की सफलता का श्रेय लेने का प्रयास न किया हो। श्री दया माता ने ऐसा कभी नहीं किया, अपने आलेखों तथा वक्तव्यों में उन्होंने सदा उन्हीं को श्रेय दिया जिन्हें दिया जाना चाहिये था—हमारे गुरु को तथा ईश्वर को। योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के संन्यासियों एवं अनुयायियों की भावी पीढ़ियों को श्री दया माताजी के उदाहरणीय जीवन से प्रेरणा मिलेगी कि वे अपना जीवन करुणामय एवं प्रेमपूर्ण विनम्रता के साथ कैसे जीयें।”

जे. सी. पुर्तगालः “एक ओर होते हैं महान् गुरुजन: वे प्रकाश पुंज के समान होते हैं जो संसार के विप्लव भरे समयों में मानवजाति को अंधेरे और निराशा में राह दिखाते हैं; और वहीं दूसरी ओर होते हैं शिष्य, जिनका कार्य इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। उनका कर्त्तव्य होता है उस प्रकाश पुंज को यथावत् रखना और उसका संवर्द्धन करना, ताकि वह कभी बुझने या मन्द न होने पाये, ताकि कठिन समयों में वह हमें राह दिखाता रहे। ऐसा था हमारी पूज्य दया माताजी का मिशन। वे हमारे गुरुजी की शिक्षाओं एवं उनके मिशन रूपी प्रकाश-पुंज की रक्षक थीं।”

ई. आर., न्यू यॉर्क: “जब हमारी अत्यन्त प्रिय श्री दया माताजी जैसी किसी आत्मा का महाप्रयाण होता है तो भावनाओं के आवेग को शब्दों में व्यक्त कर पाना बहुत कठिन हो जाता है। जिस प्रखरता से उन्होंने गुरुजी की शिक्षाओं की शुद्धता की दत्तचित्त रक्षा की, वह वर्तमान युग में अद्वितीय है।

“उनकी आदर्श निःस्वार्थता, उनका अडिग समर्पण, उनकी अद्भुत निष्ठा, उनकी अत्यन्त प्रबल आध्यात्मिकता, और विलक्षण सादगी कुछ ऐसे गुण हैं जिनका वर्तमान संसार में नितान्त अभाव है; और इन गुणों के साथ वे उस परमब्रह्म के प्रति अथाह प्रेम और भक्तिभाव के साथ अपना कर्त्तव्य निभाती गई जिसके कभी-न-कभी साक्षात् दर्शन करने की आकांक्षा हम सभी में होनी चाहिये। उन्होंने न केवल एक आदर्श और अनुपम उदाहरण स्थापित किया, बल्कि अपने पीछे एक ऐसी विरासत भी छोड़ी जिसकी पुनरावृत्ति निकट भविष्य में हो पाना सम्भव नहीं है।

“दया माताजी के जीवन-कार्य का दायरा मानव-बुद्धि की सीमा से परे है। शब्द बोले जा सकते हैं, पुस्तकें लिखी जा सकती हैं, परन्तु ईश्वर एवं गुरुदेव के कार्य के साथ उनकी वह उदाहरणीय समस्वरता सदा जीवन्त रहेगी जिसका अनुकरण बिना अपवाद हम सभी को करना चाहिये और जिसे हमें अपने जीवन में कार्यान्वित करना चाहिये।

“अपने राजा की विजय के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये तैयार एक सच्चे योद्धा के पराक्रम के साथ ईश्वर एवं गुरुदेव की प्रेम रूपी मशाल लेकर चलने वाली वे एक सच्ची ध्वजावाहक थीं।”

ओ. तथा डी.बी., बल्गेरिया: “माताजी को हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिनके प्रेम और करुणा ने हमारे हृदयों को स्पर्श किया और उन्हें दिव्य उत्साह से भर दिया।”

एल. एम. कनॅक्टिकट: “मुझे दया माताजी से व्यक्तिगत रूप से मिलने का सौभाग्य कभी प्राप्त नहीं हुआ, पर मेरी साधना के इन वर्षों में ऐसा कई बार हुआ जब वे मेरे सपनों में आई। एक बार जब अपने एक मित्र की मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले मैं उसके लिये उत्कट प्रार्थना कर रहा था, तब माँ आईं और आशीर्वाद के रूप में उन्होंने अपने माथे से मेरे माथे पर स्पर्श किया। इस तरह उन्होंने मेरे अन्तर्ज्ञान द्वारा मुझे यह शक्तिशाली उपाय दिखाया कि मुझे भी अपने मित्र के लिये प्रार्थना करते समय इसी प्रकार मानसदर्शन करना चाहिये। तो आप देख सकते हैं कि हालाँकि मैं उनसे कभी मिला नहीं, फिर भी मेरे जीवन में माँ की उपस्थिति बेहद वास्तविक तथा सजीव रूप में थी।”

अनाम पत्र, जर्मनी: “मैं कोई कहानी नहीं सुनाना चाहता; मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि वे मेरे हृदय में हैं। वे मेरा आदर्श हैं। मैं उनके जैसा बनना चाहता हूँ।”

अनाम पत्र, कैलिफ़ोर्नियाः “सन् 2003 में, छः महीने के अन्तराल में यह पता चला कि मेरी माँ और मेरे पति, दोनों का कैंसर सबसे बढ़ी हुई अवस्था में था, और दोनों के पास बहुत कम समय बचा था। दोनों एक साथ गम्भीर रूप से बीमार हो गये थे। मैं अन्तिम बार ईस्ट कोस्ट (East Coast) जा पायी, और मुझे संतोष है कि मेरी माँ ने मेरी बाहों में शान्तिपूर्वक आखिरी साँस ली। उनकी मृत्यु के दो दिन बाद मुझे फ़ोन आया कि मैं घर लौट आऊँ क्योंकि मेरे पति की हालत बिगड़ रही थी। मेरे घर आने के कुछ दिन बाद ही उन्हें अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (Intensive Care Unit) में दाखिल करना पड़ा, और उनके बचने की उम्मीद नहीं थी। हालाँकि मैं जानती थी कि जगन्माता मेरे साथ हैं पर उस रात मैंने उनसे गहरी प्रार्थना की कि वे इसके प्रमाण में मुझे कोई मानवीय चिह्न भी दें। मैं स्वयं को संभाले रखने के लिये जूझ रही थी और समय-समय पर मेरा दुःख असहनीय हो जाता था।

अगले ही दिन मेरे पास अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय से एक फ़ोन आया। मैं हतप्रभ रह गयी क्योंकि मैनें वहाँ कोई फ़ोन या पत्र नहीं भेजा था। उधर से एक मधुर आवाज़ ने कहा, “एक संन्यासिनी से आपकी बात करवाने के लिये मैं आपका समय चाहती हूँ क्योंकि आपके नाम दया माताजी का सन्देश है। लेकिन इससे पहले उन्होंने मुझसे आपको यह बताने के लिये कहा है कि जगन्माता सदा आपके साथ हैं।” यह सुनते ही मैं घुटनों के बल गिर पड़ी और असीम कृतज्ञता में सुबकने लगी। कुछ क्षण बाद ही एक संन्यासिनी फ़ोन पर आईं। उन्होंने प्रिय माताजी का संदेश पढ़कर सुनाया और मुझे सांत्वना दी। यह माताजी के ईश्वर एवं गुरु के साथ पूर्ण समस्वरता का सशक्त उदाहरण है। मुझे माताजी से सशरीर मिलने का सौभाग्य कभी नहीं मिला लेकिन उनका प्रेम तथा उनकी करुणा मेरे हृदय और आत्मा पर अंकित हैं।”

डब्ल्यू. सी., ऑस्ट्रेलिया: “मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ कि मैं माँ को 1993 के वार्षिक अधिवेशन में बोलते हुए सुन और देख सका। वह शाम मैं अपने जीवन के सर्वाधिक अमूल्य अनुभव की तरह संजोकर रखूगा। जैसे ही उन्होंने कमरे में कदम रखा, सारा कमरा शुद्ध प्रेम से सराबोर हो गया। उस अनुभव को मैं सारी उम्र संजोकर रखना चाहता हूँ।”

अनाम पत्र, कॅनेडा: “उनकी उपस्थिति में होना एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। हम उनकी प्रेम-तरंगों में ओतप्रोत थे और उस प्रेम ने हमें आनन्द के अश्रुओं से भिगो दिया था।”

एस. डब्ल्यू. ऑरिगन: “हममें से जो लोग प्रिय दया माताजी और सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की शिक्षाओं के साथ वस्तुतः ‘बड़े हुए हैं’, उनके लिये माँ को अपने बीच अनुभव करना और उनके प्रेम को पहले से अधिक मूर्त रूप में अनुभव करना एक अद्भुत अनुभव है। मुझे लगता है कि इतने वर्षों से मैं मानो साइकिल चलाना सीख रहा हूँ और वे मरे साथ-साथ दौड़ रही हैं—कि अगर मैं अधिक डगमगा जाऊँ तो वे मुझे संभालने के लिये तैयार रहें। पर मैं जानता हूँ कि मैं ठीक रहूँगा; उन्होंने अपने उदाहरण द्वारा मुझे वह सिखाया जो मुझे सीखना चाहिये था—अडिग समर्पण तथा गुरु-शिष्य सम्बन्ध एवं परमहंस योगानन्दजी की शिक्षाओं के प्रति सम्मान—और यह ज्ञान कि हमें ईश्वर का शाश्वत प्रेम प्राप्त है। अब हम उसी दिव्य-प्रेम को सब के लिये बहने दें।”

एम. एस., जर्मनी: “हमारी प्रिय दया माताजी के निधन का समाचार सुनते ही मुझे दुःख का झटका लगा। तीस वर्षों से अधिक की मेरी आध्यात्मिक यात्रा प्रिय माँ की अध्यक्षता और उनके आध्यात्मिक नेतृत्व में ही हुई है। मैंने माँ की पुस्तक Finding the Joy Within You उठायी और 1948 में उन्हें हुआ वह अनुभव पढ़ा जिसमें वे लगभग मृत्यु के मुख में चली गई थीं। इससे मुझे कुछ सांत्वना मिली और मैं कृतज्ञता से भर गया कि किस तरह उन्होंने बासठ वर्षों तक हमारे आध्यात्मिक परिवार और सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की आधारशिला बने रहने के ऐसे कार्य का बीड़ा उठाया जो मनुष्य की कल्पना से परे है! मुझे विश्वास है कि जिस अद्भुत प्रेम का अनुभव उन्हें तब हुआ था, आज उसी में वे पूर्णतया विलीन हो चुकी हैं।”

एल. डब्ल्यू., ऑरिगनः “मैंने उन्हें जब भी पत्र लिखा, उन्होंने मुझे हमेशा उत्तर दिया; यहाँ तक कि तब भी जब मैंने कहा कि उन्हें उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है। पूरे संसार में न जाने कितने लोगों को उन्होंने अपने आँचल की छाया तले रखा और अपने जीवन में प्रतिदिन उन्हें पत्र लिखे, परामर्श दिये, तथा उनके लिये प्रार्थना की! दया माँ एक सच्ची संत हैं। जिनसे भी मैं आज तक मिला हूँ, उनमें सबसे सुन्दर आत्मा। मेरा जीवन अधिकांशतः उनके उदाहरण और निःशर्त प्रेम के कारण ही बदल सका।”

एन. एस., भारत: “2001 में मैंने अपनी कम्पनी शुरू की थी। माँ से आशीर्वाद लेने के लिये मैंने उन्हें पत्र लिखा, लेकिन उनकी इतनी सारी ज़िम्मेदारियों और समय के अभाव के बारे में जानते हुए वास्तव में मैं जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था। पर जब मेरे काम की शुरूआत का उत्साहवर्धन करते हुए उनका परामर्श भरा पत्र मुझे मिला तो मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा। उस पत्र के शब्दों में प्रेम और आत्मीयता थी, मानो वे मुझे युगों से जानती हों, जबकि हम कभी मिले भी नहीं थे।

“माँ का यह पत्र मेरे लिये अब तक अत्यन्त मंगलकारी सिद्ध हुआ है—तब से लेकर अब तक मैंने इसे फ्रेम करवा कर अपने ऑफिस के कमरे में टांगा हुआ है। जब यह पत्र मिला तो मुझे यह एक शुभ-शगुन दिखाई दिया, शायद इसलिये क्योंकि मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी। माँ का निर्मल चरित्र और सेवाशील स्वभाव, इस कॉर्पोरेट ‘जंगल’ में मेरे जैसे व्यक्तियों के लिये मार्गदर्शक प्रकाश की तरह हैं। उनका यह मूल मन्त्र, ‘प्रेम करो, सेवा करो और बाकी सब ईश्वर पर छोड़ दो’, मेरे व्यापारिक सफ़र में अत्यन्त प्रेरणाप्रद सिद्ध हुआ। आठ दशकों तक गुरुजी के आदर्शों को इस तरह विकार-रहित रूप से संभाले रखने के लिये मुझे उन पर कितना गर्व है!”

एच. एस., कैलिफ़ोर्निया: “मैं दया माताजी से कभी मिला नहीं, पर उनके निधन में मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कि मैं उन्हें सदा से जानता हूँ। मेरे लिये वे शक्ति और सुरक्षा के पर्वत की तरह थीं। ‘वे हैं’—बस इतना जानने मात्र से मुझे सुकून मिल जाता था।… मानव देह में वे ज्ञान, अनुग्रह, और प्रेम—तीनों का प्रतीक थीं।”

ई. बी. कैलिफ़ोर्निया: “अपने जीवन पर उनके प्रभाव का मैं पूरी तरह बखान नहीं कर सकताः मेरे लिये वे नारी के दिव्य रूप और प्रेम का आदर्श थीं।”

आर. के., जर्मनी: “प्रिय श्री दया माँ।… इन वर्षों में आपके भेजे पत्रों के लिये मैं आपका बहुत आभारी हूँ। गुरुजी और आपने मेरा जीवन बदल दिया। आपकी सलाह, निःशर्त प्रेम, तथा अनवरत आशीर्वादों ने हमेशा मेरी मदद की है। ओह माँ, मैं आपसे हमेशा प्रेम करता हूँ। मैं अपना हृदय, मन, और अपनी आत्मा अब भी आपके आशीषों के लिये खोले रखूँगा। आपकी पावन पुस्तक Enter the Quiet Heart (Die Stimme des Herzens) मेरी प्रतिदिन की बाइबिल है।”

जी.टी., कैलिफ़ोर्निया: “1970 के अन्त में, वार्षिक अधिवेशन के बाद, मुझे दया माताजी के एक सत्संग में शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अपने वक्तव्य के बाद ध्यान मन्दिर से निकलते समय उन्होंने हर भक्त का अभिवादन किया। उन्हें प्रणाम करते समय मैंने उनकी आँखों में देखा। मुझे लगा कि मैं अनन्तता की आँखों में निहार रहा हूँ, ईश्वर की आँखों में। उनमें अथाह गहराई थी। मैंने पहले कभी ऐसा महसूस नहीं किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय में मेरा स्वागत किया, और मैं स्तब्ध अवस्था में ध्यान-मन्दिर से बाहर आया। यह अनुभव मैं कभी भूल नहीं सकता।…

“हममें से जो लोग गुरुजी से नहीं मिले, दया माताजी उनके लिये गुरुजी की शिक्षाओं का जीवन्त उदाहरण थीं।”

जी. एच. कैलिफ़ोर्निया: “कई वर्ष पूर्व, भक्तों की एक टोली के साथ मुझे दया माताजी से मिलने अन्तर्राष्ट्रीय मुख्यालय बुलाया गया। वहाँ पुस्तकालय में उन्होंने हमें एक अनौपचारिक सत्संग दिया। उनकी आँखों ने मुझे एकदम मन्त्रमुग्ध कर दिया। मैंने ‘सागर-सी गहरी आँखें’ मुहावरा सुना तो था पर इससे पहले मैंने कभी किसी की आँखों में इतनी गहराई, शक्ति, और सौन्दर्य नहीं देखा था। मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ कि मैं इस पृथ्वी पर उस समय जन्मा जब हमारी प्यारी माँ भी यहीं थीं।”

एम. पी. नेवाडा: “मेरे लिये तो यह वर्णन करने की शुरूआत कर पाना भी सम्भव नहीं है कि माँ ने मेरा जीवन किस तरह बदल डाला। पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों से उनके व्याख्यानों को सुनना या उनके शब्दों को पढ़ना मेरी दिनचर्या का अंग बन चुका है, और वास्तव में इन्होंने मेरे जीवन को परिवर्तित कर दिया है। उन्होंने हमेशा मुझे उत्साह और आध्यात्मिक दृढता तथा ईश्वर की ललक से आवेशित रखा है। पर इससे भी अधिक, उन्होंने मुझे उस प्रियतम प्रभु के साथ एक बड़ी ही आत्मीय, मधुर, प्रेममय, विश्वासपूर्ण, और उन्मादक मित्रता स्थापित करने में मदद की है।

“दया माँ ने मेरी ध्यान की अवधियों को ईश्वर के साथ सच्चे सम्पर्क में बदलने में सहायता की है। और उन्होंने मेरे कार्यों को ईश्वर की उपस्थिति में किये गये प्रेमपूर्ण कृत्यों में बदलने में सहायता की है। माँ ने मुझे दिखाया कि शिष्य होने का क्या अर्थ है, एक मित्र होने का क्या अर्थ है, एक विनम्र सेवक होने का क्या अर्थ है, एक नेता होने का क्या अर्थ है, और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कि एक प्रेमी होने का क्या अर्थ है; एक ऐसा प्रेमी जो ईश्वर-भक्ति की मदिरा से मदोन्मत्त है।”

अनाम पत्र, मैरीलैंड: “उनकी उपस्थिति, उनकी सफलतायें, उनका उदाहरण, कई पीढ़ियों तक सितारे की तरह जगमाते रहेंगे। भारत का एक सर्वोत्तम अंश, दया माता के रूप में लॉस एन्जिलिस में रहता था।”

एस. एल., टैक्ससः “उनकी जीवन-गाथा ने मुझसे बहुत कुछ कह डाला। गुरु के प्रति उनकी भक्ति त्रुटिहीन थी और उनका सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का नेतृत्व अद्भुत था। उन्होंने मुझे निरन्तर प्रेरणा दी है कि ईश्वर से गहन सम्पर्क बनाये रखने का प्रयास करते हुए आध्यात्मिक जीवन कैसे जीया जाये। शब्दों में यह बयान कर पाना सम्भव नहीं है कि मेरे पूरे जीवन पर उनका कितना गहरा प्रभाव पड़ा है, और पड़ता रहेगा।”

अनाम पत्र, स्पेन: “आप उन्हें देखते ही बिना किसी संदेह के यह जान जाते थे कि श्री दया माता प्रकाश, प्रेम, और अच्छाई की एक मूर्ति थीं। हमारे परिवार के लिये श्री दया माता सदा प्रेरणा का अक्षय स्रोत रही हैं तथा आगे भी रहेंगी; तथा इस बात का आदर्श उदाहरण भी कि परमहंस योगानन्दजी के सच्चे शिष्य को कैसा होना चाहिये।”

पी॰डी॰, कैलीफोर्निया:

“मैं जब कभी भी माँ के बारे में सोचता हूँ, सदैव प्रेम का अनुभव करता हूँ।”

एच. डब्ल्यू., ऑस्ट्रेलिया: “यह विशाल प्रशान्त महासागर अब मुझे माँ के चुम्बकीय व्यक्तित्व से दूर नहीं रखता। हमारी प्रिय अध्यक्षा, प्रमुख, शिक्षक, मित्र, अपने गुरु के पास उस प्रकाशमय संसार में चली गयी हैं। परमानन्द की लहरें हमारे हृदयों को उनके मधुर हर्ष से धोती हैं। यद्यपि हम किनारे पर छूट गये हैं पर हम अकेले नहीं हैं और न ही हमें शोक करना चाहिये कि वे अब हमारे पास नहीं गुरुदेव के पास हैं। गुरु और शिष्य की प्रेम-तंरगें संसार भर में पहुँचती हैं। करुणामयी माँ ! आपके अनुकम्पाशील जीवन के लिये आपको कोटि-कोटि धन्यवाद!”

एन. आर. कॅनेडा: “चाहे पृथ्वी पर हों या स्वर्ग में— श्री दया माता मेरे पथ को आलोकित करती हैं।”

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