भगवद्गीता के ज्ञान पर प्रेरणाप्रद प्रवचनों की इस श्रृंखला में कुल पांच प्रवचन आयोजित किये गए।

प्रथम प्रवचन में स्वामी स्मरणानन्द गिरि ने ‘ईश्वर-अर्जुन संवाद’ पुस्तक का परिचय दिया, जो कि श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित भगवद्गीता पर एक नई और अभूतपूर्व व्याख्या है। अपने सत्संग में स्वामी स्मरणानन्दजी ने उदाहरणों व छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा परमहंसजी की टीका पर प्रकाश डालते हुए समझाया कि कैसे हमारे अंदर उपस्थित कौरव (बुरी वृत्तियां) हमारी आध्यात्मिक प्रगति को बाधित करते हैं; और कैसे आंतरिक कुरुक्षेत्र के द्वंद में पाण्डवों (अच्छी वृत्तियों) का पोषण अंततः कौरवों को परास्त कर, हमें आत्म-साक्षात्कार के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति की ओर ले जाएगा।

द्वितीय सत्संग में, स्वामीजी ने परमहंस योगानन्दजी की प्रथम अध्याय के श्लोक 2 और 3 की व्याख्या के आधार पर बताया, कि किस प्रकार हम बुरी आदतों पर शांत, अंत:प्रज्ञाजन्य क्षमता द्वारा विजय प्राप्त कर सकते हैं जो कि नियमित ध्यान द्वारा विकसित होती है।

तृतीय सत्संग में, स्वामीजी ने श्लोक 4, 5, और 6 की व्याख्या की, जो प्रमस्तिष्कमेरुदण्डीय केंद्रों में आध्यात्मिक सैनिकों का वर्णन करते हैं — भक्ति, दिव्य स्मरणशक्ति, विवेकशील बुद्धि, प्राणायाम, और अन्य जो कुरुक्षेत्र की आंतरिक लड़ाई में एक भक्त की सहायता करते हैं।

चतुर्थ एवं पंचम सत्संग मेंस्वामीजी ने श्लोक 7, 8 और में वर्णित कौरवों की ओर संकेत किया जो आध्यात्मिक प्रगति का विरोध करने वाले विशिष्ट सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैंजिनसे एक भक्त को सावधान रहना चाहिए।

भगवद्गीता सत्संग श्रृंखला की समय सारणी :

जीवन संघर्ष को जीतना (मेरे अंतर का कुरुक्षेत्र ) :

  • भाग 1 : शनिवार, 12 जून, 2021, शाम 6:30 बजे से 7:45 बजे तक (भारतीय समयानुसार)
  • भाग 2 : शनिवार, 3 जुलाई, 2021, शाम 6:30 बजे से 7:45 बजे तक (भारतीय समयानुसार)
  • भाग 3 : शनिवार, 17 जुलाई, 2021, शाम 6:30 बजे से 7:45 बजे तक (भारतीय समयानुसार)
  • भाग 4 : शनिवार, 31 जुलाई, 2021, शाम 6:30 बजे से 7:45 बजे तक (भारतीय समयानुसार)
  • भाग 5 : शुक्रवार,  6 अगस्त, 2021, शाम 6:30 बजे से 7:45 बजे तक (भारतीय समयानुसार)

‘ईश्वर-अर्जुन संवाद’ की शास्त्रीय व्याख्या के बारे में

आध्यात्मिक गौरव ग्रंथ ‘योगी कथामृत ’ के लेखक परमहंस योगानन्दजी ने भगवद्गीता की व्याख्या दिव्य अंतर्दृष्टि से की है। अपनी टीका में इसकी मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और अधिभौतिक गहनता की मीमांसा करते हुए — जिसमें प्रतिदिन के विचारों और कार्यों के सूक्ष्म कारणों से लेकर ब्रह्मांडीय व्यवस्था के विराट स्वरूप तक के विषय सम्मिलित हैं — योगानन्दजी आत्मा की सम्पूर्ण ज्ञानोदय तक की यात्रा का विशद वृत्तान्त प्रस्तुत करते हैं।

गीता में वर्णित ध्यान और उचित कर्म के संतुलित पथ को स्पष्ट रूप से समझाते हुए परमहंसजी दर्शाते हैं कि हम अपने लिए आध्यात्मिक संपूर्णता, शांति, सादगी तथा आनंद से भरा जीवन कैसे निर्मित कर सकते हैं। अपनी जागृत अंतरात्मा के माध्यम से हम जीवन पथ के दोराहों पर, सही मार्ग चुनना जान जाते हैं; अपनी पीछे खींचने वाली कमियों और आगे बढ़ाने वाले सकारात्मक गुणों की पहचान कर पाते हैं; और रास्ते में पड़ने वाले गड्ढों को पहचानना व उनसे बचना सीख जाते हैं।

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