योगानन्दजी और श्रीमद्भगवद्गीता

योगानन्दजी और श्रीमद्भगवद्गीता

परमहंस योगानन्दजी की ‘ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता’
के श्री श्री दया माता द्वारा प्रस्तावना में से

“कोई भी सिद्ध मानव जाति को कुछ सत्य प्रदान किये बिना इस संसार से प्रस्थान नहीं करता। प्रत्येक मुक्त आत्मा को अपने आत्मसाक्षात्कार का प्रकाश दूसरों पर डालना ही होता है।” अपने विश्व अभियान के प्रारम्भिक दिनों में परमहंस योगानन्दजी द्वारा कहे गये शास्त्रीय वचन — और उन्होंने कैसी उदारता के साथ इस दायित्व को पूर्ण किया! यदि परमहंस योगानन्दजी ने भावी पीढ़ियों के लिये अपने व्याख्यानों और लेखनों से अधिक कुछ भी न छोड़ा होता, तब भी वे वास्तव में ईश्वर के दिव्य प्रकाश के एक उदार दाता के रूप में उचित स्थान पाते। उनके ईश्वर-सम्पर्क से साहित्यिक रचनायें जिस प्रचुरता से प्रकट हुईं, उनमें श्रीमद्भगवद्गीता का अनुवाद एवं टीका, गुरु की सबसे व्यापक भेंट मानी जा सकती है — मात्र परिमाण में ही नहीं, अपितु अपने सर्वतोमुखी विचारों में भी।…

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा बताये गये ध्यानयोग के विज्ञान में परमहंसजी पूर्ण सिद्ध थे। मैं उन्हें अनायास ही समाधि की अनुभवातीत अवस्था में प्रवेश करते प्रायः देखती थी; हममें से प्रत्येक जो उस वक्त उनके पास होता था, उनके ईश्वर-सम्पर्क से निःसृत होती हुई, अकथनीय शान्ति तथा ब्रह्मानन्द से भर जाता था। एक स्पर्श अथवा शब्द, अथवा दृष्टिपात के द्वारा ही, वे दूसरों को ईश्वरीय उपस्थिति का गहरा बोध करा सकते थे, अथवा अन्तर्सम्पर्क रखने वाले शिष्यों को, अधिचेतन समाधि का अनुभव प्रदान कर सकते थे।

उपनिषदों का एक उद्धरण हमें बताता है : “वह ऋषि जो स्वयं को सदैव केवल ब्रह्म रूपी अमृत-पान में मग्न रखता है, उस अमृत पान में जो निरन्तर ध्यान का परिणाम है, वह ऋषि संन्यासियों में महानतम, परमहंस, और सांसारिक दोषों से मुक्त एक दार्शनिक, अर्थात् अवधूत बन जाता है। उसके दर्शन मात्र से सारा संसार पवित्र हो जाता है। उसकी सेवा में समर्पित एक अज्ञानी व्यक्ति भी मुक्त हो जाता है।”

परमहंस योगानन्दजी एक सद्गुरु, एक ईश्वर प्राप्त गुरु के वर्णन में एकदम पूरे उतरते थे; वे ज्ञान, कर्म, और ईश्वर-प्रेम में, एक जीवन्त शास्त्र के समान थे। गीता के कथनानुसार, उनकी त्याग एवं सेवा की भावना, सांसारिक वस्तुओं एवं सहस्रों अनुयायियों द्वारा उन पर बरसाई गयी प्रशंसा से पूर्णतः निरासक्त थी। उनका अदम्य आन्तरिक बल और उनकी आध्यात्मिक शक्ति, एक मधुरतम स्वाभाविक विनम्रता में छिपी रहती थी, जिसमें आत्म-केन्द्रित अहं को रहने का कोई स्थान नहीं मिलता था। यहाँ तक कि जब अपने और अपने कार्य के विषय में बात करते थे, उनमें व्यक्तिगत उपलब्धि की कोई भावना नहीं होती थी। ईश्वर को अपने अस्तित्व के सच्चे सार के रूप में पूर्ण साक्षात्कार कर लेने के पश्चात् वे ईश्वर से पृथक अपनी कोई पहचान जानते ही नहीं थे।

श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिये गये दिव्य रहस्योद्घाटनों का चर्मोत्कर्ष गीता के ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूप-दर्शन के रूप में आता है। इस दर्शन में ईश्वर अपना ब्रह्माण्डीय स्वरूप प्रकट करते हैं : ब्रह्माण्डों के ऊपर ब्रह्माण्ड, कल्पनातीत रूप से विस्तृत और परमेश्वर की अनन्त सर्वशक्तिमता द्वारा सृजित एवं सम्पोषित हैं, जिसे उपपरमाण्विक पदार्थ के लघुतम कण और आकाशगंगाओं सम्बन्धी विशालताओं की ब्रह्माण्डीय गति — और लौकिक और आकाशीय लोकों के प्रत्येक जीव के प्रत्येक विचार, भाव, और कर्म का एक साथ ज्ञान है।

जब परमहंस योगानन्दजी को एक ऐसे ही वैश्विक दर्शन का आशीर्वाद मिला था, तब हमने गुरुजी की चेतना की सर्वव्यापकता, और उनके विस्तृत आध्यात्मिक प्रभाव का अनुभव किया था। जून 1948 में एक दिन, देर शाम से पूरी रात भर और अगली सुबह लगभग दस बजे तक, यह वैश्विक दर्शन उनकी दिव्य दृष्टि के सामने था। उनके द्वारा समाधि अवस्था में ब्रह्माण्डीय रहस्योद्घाटन के परमानन्दायक वर्णन से हममें से कुछ शिष्यों ने इस अद्वितीय अनुभूति के कुछ अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त किया।

उस विस्मयकारी प्रेरणादायक घटना ने यह भविष्यवाणी की थी कि धरती पर गुरुजी का समय समाप्त हो रहा था। शीघ्र ही इसके पश्चात्, परमहंसजी ने मोजावे मरुभूमि के एक छोटे से आश्रम में अधिक-से-अधिक समय एकान्त में व्यतीत करना आरम्भ किया। और अपने बचे हुए अल्प समय का अधिकांश भाग अपने लेखनों को पूर्ण करने में लगाने लगे। जो साहित्यिक सन्देश परमहंसजी संसार के लिये छोड़ना चाहते थे, उन पर उनकी गम्भीर एकाग्रता का वह समय, हममें से उन शिष्यों के लिये वरदान स्वरूप था जो उनके सान्निध्य में रह सकते थे। जिन सत्यों को वे भीतर देख रहे और बाहर व्यक्त कर रहे थे, उनके साथ वे आन्तरिक रूप से पूर्णतः एक थे। परमहंसजी के एकान्तवास के आसपास मैदान में काम कर रहे एक संन्यासी को याद आया, “वे कुछ मिनटों के लिये बाहर प्रांगण में आये। उनके नेत्रों में अनन्त दूरी व्यक्त हो रही थी, और उन्होंने मुझसे कहा : ‘तीनों लोक मेरे भीतर बुलबुलों की भाँति तैर रहे हैं।’ उनसे विकीर्ण हो रही प्रचण्ड शक्ति ने, वास्तव में मुझे उनसे कई कदम दूर पीछे धकेल दिया।”

एक और संन्यासी, उस कमरे में प्रवेश करते हुए जहाँ गुरुजी काम कर रहे थे, स्मरण करते हैं : “उस कमरे का स्पन्दन अविश्वसनीय था; यह ईश्वर में प्रवेश करने जैसा था।”

परमहंसजी ने इस अवधि में एक छात्र को लिखा, “मैं सारा दिन धर्म-शास्त्रों सम्बन्धी व्याख्यायें और पत्र लिखवाता हूँ। मेरी आँखें इस जगत् के लिए मुँदी रहती है, परन्तु स्वर्ग में सदा खुली होती हैं।”

परमहंसजी का गीता की अपनी व्याख्या पर कार्य वर्षों पूर्व आरम्भ हो गया था। एक प्रारम्भिक धारावाहिक प्रकाशन, सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की पत्रिका में सन् 1932 में आरम्भ हुआ था जो उनके मरुस्थल में रहने की इस अवधि में पूर्ण हुआ। इसमें, इतने वर्षों की अवधि में लिखी गयी सामग्री की समीक्षा, अनेक बिन्दुओं का स्पष्टीकरण और प्रवर्धन, उन अनुच्छेदों का संक्षिप्तीकरण जिनमें वह दोहराव था जो कि केवल नये पाठकों के लिये धारावाहिकता में आवश्यक था, कई नयी प्रेरणाओं को सम्मिलित करना — जिनमें योग की गहरी दार्शनिक अवधारणाओं के कई विवरण भी थे, जिन्हें उन सामान्य पाठकों को बताने का प्रयास गुरुजी ने प्रारम्भिक वर्षों में नहीं किया था। सामान्य श्रोताजन तब तक विज्ञान के क्षेत्र की भेद खोलने वाली उन खोजों से परिचित नहीं थे, जिन्होंने गीता के ब्रह्माण्ड-विज्ञान और मनुष्य के भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिक्षेत्र को, पश्चिमी मन के समझने योग्य बनाया है — इन सबका साहित्यिक रूप से एक पुस्तक में प्रकाशन के लिये तैयार करना सम्मिलित था।

सम्पादकीय कार्य में सहायता के लिये, गुरुदेव तारा माता (लॉरी वी. प्रैट) पर निर्भर करते थे। वह एक अति उन्नत शिष्या थीं जो उनसे सन् 1924 में मिली थीं, और जिन्होंने उनकी पुस्तकों एवं अन्य लेखनों पर उनके साथ, भिन्न अवधियों में, पच्चीस वर्षों से भी अधिक समय तक कार्य किया था। मैं निस्सन्देह जानती हूँ कि परमहंसजी इस निष्ठावान् शिष्या द्वारा निभायी गयी भूमिका के प्रति उचित आभार प्रदर्शन एवं प्रशंसा के बिना, इस पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति कभी नहीं देते। “वह एक महान् योगी थी,” उन्होंने मुझे बताया “जिसने कई जन्म संसार से दूर छिप कर, भारत में बिताये थे। वह इस जन्म में इस कार्य को करने आयी है।” अनेक सार्वजनिक अवसरों पर वे तारा माता के साहित्यिक कौशल और दार्शनिक ज्ञान पर, अपना मूल्यांकन व्यक्त करते थे : “वह देश में सबसे अच्छी सम्पादक है, सम्भवतः कहीं भी। मेरे महान् गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी के अतिरिक्त, ऐसा और कोई नहीं है जिसके साथ भारतीय दर्शन पर बात करके, मुझे लॉरी से अधिक आनन्द आया हो।”

अपने जीवन के परवर्ती वर्षों में परमहंसजी ने एक और संन्यासी शिष्या, मृणालिनी माता को, जिन्हें उन्होंने लेखनों के सम्पादन के लिये चुना था, प्रशिक्षित करना आरम्भ कर दिया था। गुरुदेव ने हम सबको मृणालिनी माता की वह भूमिका स्पष्ट कर दी थी, जिसके लिये वे उन्हें तैयार कर रहे थे। गुरुदेव ने मृणालिनी माता को अपनी शिक्षाओं के प्रत्येक पक्ष पर और अपने लेखनों एवं व्याख्यानों की तैयारी और प्रस्तुति के विषय में अपनी इच्छाओं के प्रति व्यक्तिगत अनुदेश दिये थे।

एक दिन पृथ्वी पर अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गुरुजी ने बताया : “मैं लॉरी के लिये बहुत चिन्तित हूँ। उसका स्वास्थ्य उसे मेरे लेखन-कार्य को समाप्त नहीं करने देगा।”

गुरुजी की तारा माता पर अत्यधिक निर्भरता को जानते हुए मृणालिनी माता ने चिन्ता व्यक्त की : “परन्तु गुरुदेव, फिर उस कार्य को कौन कर सकता है?”

गुरुदेव ने शान्ति से निर्णायक उत्तर दिया था : “उसे तुम पूर्ण करोगी।”

सन् 1952 में, परमहंसजी की महासमाधि के पश्चात् के वर्षों में, तारा माता ने भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक की गुरुजी की विवेचना को, पत्रिका में क्रमबद्धता को निरन्तर बनाए रखा हालाँकि उनके पास योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप निदेशक मण्डल के एक सदस्य एवं पदाधिकारी और सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप प्रकाशनों के प्रधान सम्पादक के रूप में कई व्यस्ततापूर्ण उत्तरदायित्व भी थे। तथापि जैसी कि परमहंसजी ने भविष्यवाणी की थी, गुरुजी के निर्देशानुसार गीता की पाण्डुलिपि तैयार करने के पहले ही तारा माता चल बसीं। तब यह कार्य मृणालिनी माता के कन्धों पर आ पड़ा। जैसा गुरुजी ने पहले ही देखा था, तारा माता के जाने के उपरान्त, गुरुजी के विचारों के साथ अपनी एकात्मता और गुरुजी द्वारा दिये वर्षों के प्रशिक्षण के कारण, वह मृणालिनी माता ही हैं जो इसे भली-भाँति पूर्ण सकती थीं।…

परमहंस योगानन्दजी की इस धरती पर दोहरी भूमिका थी। उनका नाम और उनके कार्यकलाप, जिस विश्वव्यापी संस्था, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप — की उन्होंने स्थापना की, उसके साथ विशिष्ट रूप से अभिन्न हैं; और उन सहस्रों लोगों के व्यक्तिगत गुरु भी हैं जो उनकी वाईएसएस/एसआरएफ़ की क्रियायोग की शिक्षाओं को अंगीकार करते हैं। परन्तु वे एक जगद्गुरु, अर्थात् विश्वगुरु भी हैं, जिनका जीवन और सार्वभौमिक सन्देश, अलग-अलग मार्गों और धर्मों के अनेक अनुयायियों के लिये प्रेरणा और उत्थान का स्त्रोत है — उनकी आध्यात्मिक विरासत, सारे संसार को अर्पित एक आशीर्वाद।

मैं धरती पर उनके अन्तिम दिन, 7 मार्च, 1952 को स्मरण करती हूँ। गुरुदेव बहुत शान्त थे, उनकी चेतना सामान्य से भी अधिक अन्तर्मुखी थी। उस दिन हम शिष्यों ने प्रायः देखा कि उनके नेत्र इस सीमित जगत् पर केन्द्रित नहीं थे, अपितु ईश्वर की उपस्थिति के इन्द्रियातीत साम्राज्य में देख रहे थे। जब उन्होंने कुछ बोला भी, तो वह अत्यन्त स्नेह, आभार और दया से परिपूर्ण था। परन्तु जो मेरी स्मृति में सबसे अधिक सजीव है, और जिस पर उनके कमरे में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति ने ध्यान दिया, वह गहन शान्ति और तीव्र दैवी-प्रेम के स्पन्दनों का प्रभाव था जो गुरुजी से निःसृत हो रहे थे। स्वयं जगन्माता — जो अनन्त परमात्मा का वह रूप, जो प्रेममय-सुश्रुषा, दया, और निःशर्त प्रेम के रूप में मूर्तिमान है, और जो इस संसार के लिये मुक्ति का साधन है — ने गुरुजी पर पूर्ण अधिकार कर लिया था। ऐसा लग रहा था मानो जगन्माता अपनी सम्पूर्ण सृष्टि का आलिंगन करने के लिये, गुरुजी के माध्यम से प्रेम की तरंगें भेज रही हों।

उस सायंकाल में, भारत के राजदूत के सम्मान में एक बड़े स्वागत समारोह के समय, जिसमें परमहंसजी प्रमुख वक्ता थे, महान् गुरु ने अपने शरीर का त्याग कर ईश्वर की सर्वव्यापकता में प्रवेश किया।

उन सभी दुर्लभ आत्माओं की भाँति, जो मानव जाति के उद्धारक के रूप में पृथ्वी पर आये हैं, परमहंसजी का प्रभाव उनके जाने के पश्चात् भी जीवन्त है। उनके अनुयायी उन्हें ईश्वर के दिव्य प्रेम का अवतार — एक प्रेमावतार मानते हैं। वे ईश्वर के प्रेम के साथ, अपने सृष्टिकर्ता की विस्मृति में सो रहे हृदयों को जगाने के लिये आये थे, और, जो पहले ही ईश्वर की खोज कर रहे हैं उन्हें मुक्ति का पथ प्रदान करने आये थे। गीता की पाण्डुलिपि की समीक्षा करते समय, मैंने परमहंसजी के भाष्य में पुनः उस दैवी-प्रेम के चुम्बकत्व को अनुभव किया, जो सदा हमें ईश्वर की खोज करने के लिए पुकारता है, जो प्रत्येक मानवीय आत्मा का परम लक्ष्य है, और जो जीवन पथ पर सदा अपनी सान्त्वनादायक उपस्थिति का वचन देता है।

मैं परमहंस योगानन्दजी की परिपूर्ण सार्वभौमिक प्रार्थना को बारम्बार अपनी आत्मा में गूंजते हुई सुनती हूँ। वह प्रार्थना जो उनके विश्व अभियान, और गीता के इस मुक्तिदायक रहस्योद्घाटन को हमें प्रदान करने की प्रेरणा की शक्ति को, सबसे अधिक विशिष्ट बनाती है:

परमपिता, जगन्माता, सखा, प्रियतम प्रभो,
आपका प्रेम मेरी भक्ति की वेदी पर सदा आलोकित रहे,
और मैं आपके प्रेम को सबके हृदयों में जाग्रत कर सकूँ।

“एक नवीन शास्त्र का जन्म हुआ है”

परमहंस योगानन्दजी की ‘ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता’
के श्री श्री दया माता द्वारा परिशिष्ट में से

श्रीमद्भगवद्गीता पर कई महीनों तक मरुस्थल स्थित आश्रम में कार्य करने के पश्चात् परमहंस योगानन्दजी समुद्र के निकट स्थित सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के कैलिफोर्निया स्थित एनसिनिटस आश्रम में कुछ समय के लिए रह रहे थे। एक दिन प्रातः के लगभग तीन बजे थे, और उस रात में कई घण्टों तक, वे गीता के अपने अनुवाद और व्याख्या पर गहराई से चिन्तन कर रहे थे। अन्त में, वे पास में चुपचाप बैठे शिष्य की ओर मुड़े। “जिस कार्य को मैं पूरा करने आया था, आज रात उसकी समाप्ति को देख कर तुम धन्य हुए हो। मैंने गीता की व्याख्या पूरी कर ली है। यह कार्य मुझे दिया गया था, और मैंने यह वचन दिया था कि मैं इस गीता को लिखूँगा, और यह पूरा हो गया है। सभी महान् गुरु आज रात यहाँ इस कमरे में रहे हैं, एवं आत्मिक रूप से मैंने उनसे बातचीत की है। मेरा जीवन अब क्षणों, घण्टों, दिनों — सम्भवतः वर्षों में ही सीमित है, मैं नहीं जानता; यह जगन्माता के हाथों में है। मैं केवल उनकी दया से जी रहा हूँ।”

उस रात परमहंसजी के कार्य करते समय उनके चारों ओर जो विशेष आशीर्वाद प्राप्त था उसे बाँटने की इच्छा से उन्होंने तब शेष वरिष्ठ शिष्यों को बुलाया।

बाद में, उनके शयनकक्ष के एकान्त में, परमहंसजी के दिव्य अनुभव की एक अद्भुत अगली कड़ी थी। उन्होंने हमें बताया : “कमरे के कोने में एक प्रकाश था। मैंने सोचा कि यह अवश्य प्रातः की किरणें होंगी जो परदे के छेद से आ रही हैं। पर जैसे मैं उसे देख रहा था, वह प्रकाश उज्जवल तथा विस्तारित हो गया।” विनम्रतापूर्वक लगभग बिना ध्वनि के, उन्होंने कहा : “उस दीप्त प्रकाश में से श्रीयुक्तेश्वरजी अनुमोदन की दृष्टि के साथ आये।”…

वर्षों पहले, श्रीयुक्तेश्वरजी ने उनसे कहा था : “तुम श्रीमद्भगवद्गीता के सब सत्यों को इस प्रकार अनुभव करते हो क्योंकि तुमने श्रीकृष्ण और अर्जुन के उस संवाद को सुना है जो व्यास को प्रकट हुआ था। जाओ और अपनी व्याख्याओं के साथ उस प्रकट सत्य को प्रदान करो : एक नवीन शास्त्र उत्पन्न हो जायेगा।”

इस पाण्डुलिपि पर कई महीनों और वर्षों तक कार्य करने के पश्चात्, अब परमहंसजी ने अपने गुरु की भविष्यवाणी की पूर्ति देखी। अपने शिष्यों को यह बताते हुए कि उनकी गीता की टीका पूरी हो चुकी है, एक आनन्दमयी मुस्कान के साथ उन्होंने विनम्रतापूर्वक वह दुहराया, जो श्रीयुक्तेश्वरजी ने उनसे कहा था : “एक नवीन शास्त्र का जन्म हुआ है।”

“मैंने इस गीता को ऐसे लिखा है, जैसे यह मुझे प्रकट हुई,” उन्होंने कहा, “जब मैं समाधि अवस्था में अपने महान् गुरुओं तथा श्रीमद्भगवद्गीता प्रवर्तकों के साथ जुड़ा था। जो गीता मेरे माध्यम से आई है, यह उनकी है। और मैं जानता हूँ मेरे गुरु ने क्या कहा था : “एक नई गीता, जो कई शताब्दियों से आज तक, विभिन्न व्याख्याओं के प्रकाश में केवल आंशिक रूप से उजागर हुई है, अपनी पूर्ण दीप्ति के साथ संसार के सभी सच्चे भक्तों को निमज्जित करने आ रही है।”

ईश्वर-अर्जुन संवाद: श्रीमद्भगवद्गीता, द्वारा परमहंस योगानन्द

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