गुरु पूर्णिमा – 2015 श्री श्री मृणालिनी माता का संदेश

प्रिय आत्मन्,

31 जुलाई, 2015

अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने की भारत की परंपरा का अनुसरण करने वाले भक्तों द्वारा सारे विश्व में मनाये जाने वाले गुरु पुर्णिमा के इस पवित्र दिवस पर, हम अपने प्रिय गुरुदेव, श्री श्री परमहंस योगानन्द के चरणों में अपने हृदय की भक्ति एवं कृतज्ञता अर्पित करते हैं। हम कितने धन्य हैं कि जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने में, माया के अंधकार से निकलकर ईश्वर में प्रकाश एवं स्वतन्त्रता तक की यात्रा में, ईश्वर ने हमारा शाश्वत मित्र एवं मार्गदर्शक होने के लिए अपने प्रेम के इतने पवित्र माध्यम की ओर हमें आकृष्ट किया। मैं प्रार्थना करती हूँ कि गुरु का प्रेम तथा ज्ञान प्राप्त करने के लिये आप में से प्रत्येक अपने हृदय एवं मन के द्वार को पुन: खोल दे, ताकि वे आपको वह वरदान दे सकें जिसे देना वे सबसे अधिक चाहते हैं—आपकी आत्मा के दिव्य प्रियतम से आपका मिलन।

कई जन्मों तक आप अहं के तंग पिंजरे में रहे होंगे, जहाँ आप इसकी सीमाओं को, आपकी प्रसन्नता पर इसके द्वारा लगाई गई शर्तों को, तथा इस विश्व की अप्रत्याशित परिस्थितियों के प्रति इसकी अतिसंवेदनशीलता को स्वीकार करते रहे होंगे। गुरु आत्मा के वीरोचित गुणों को जगाने के लिये आते हैं, जिनके द्वारा हम उन सभी वस्तुओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं जो हमारी जन्मजात दिव्यता की अभिव्यक्ति में बाधा डालती हैं। जैसे गुरुजी ने अपने गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी के बारे में कहा है : “वे मुझे त्रुटिरहित बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि मैं परमानंद में रहूँ। इसी में उन्हें आनंद मिलता था। वे चाहते थे कि मैं ईश्वर का बोध करूँ; और जगन्माता के साथ रहूँ जिनके लिये मेरा हृदय तड़पता था।” हमारे गुरु की भी हमारे लिये यही इच्छा है। उनके द्वारा दी गई साधना, श्रद्धापूर्वक अभ्यास करने से, हमें बिना चूके उस लक्ष्य की ओर ले जाती है, और उन्होंने हमें आश्वस्त किया है, “आपको ईश्वर ने मेरे पास भेजा है, और मैं आपको कभी नहीं छोड़ूँगा।”
उनके इस वचन में निःशर्त प्रेम निहित है जो देश और काल की सारी सीमाओं के परे जाता है तथा आप पर तब तक दृष्टि रखेगा जब तक आप ईश-चेतना को प्राप्त न कर लें। शिष्य का काम है गुरु के प्रेम को इसके सभी रूपों में पहचानना एवं ग्रहण करना–उनके मार्गदर्शक शब्दों में, प्रार्थनाओं के उत्तर में, और विशेष रूप से उन चुनौतियों तथा कठिनाइयों में जो व्यक्ति के विश्वास एवं सहनशक्ति की परीक्षा लेती हैं और उन्नति करने तथा स्वयं को बदलने के नवीन अवसर प्रस्तुत करती हैं। हममें से जो गुरुदेव के साथ रहे हैं उनके साथ प्राय: ऐसा होता था कि जब हम सोचते कि हमने आध्यात्मिक प्रगति का एक नया स्तर प्राप्त कर लिया है, ठीक उस समय वे इसका मानक बढ़ा देते थे। हमने “मैं नहीं कर सकता,” के विचार को अपनी चेतना में जाने से रोकना सीखा, और वे आपसे भी यही चाहते हैं–क्योंकि थोड़ी और प्रगति करने की आपकी तत्परता से, आप उनके आशीर्वादों को पूर्णता में ग्रहण कर पायेंगे। यदि मानव स्वभाव विरोध करता है, तो यही समय है जब कुशलतापूर्वक तर्क-वितर्क करते मन की उपेक्षा कर हम अपने हृदय की भक्ति की शांत वाणी को सुनें, जो हमसे उन पर विश्वास करने तथा उनके प्रति समर्पित होने का आग्रह करती है। समर्पण ही वह कुंजी है जो हमारी चेतना के प्रत्येक बंद द्वार को खोलेगी ताकि हम गुरु की शोधक एवं रूपांतरकारी शक्ति को ग्रहण कर सकें।

सब से बड़ा उपहार जो आप अपने गुरु को दे सकते हैं वह यह है कि आप अपनी स्वयं की मुक्ति के लिये उनके साथ सहयोग करें। उनके मानक ऊँचे हैं, तथापि वे अनंत सहानुभूति के साथ आपका मार्गदर्शन करेंगे, क्योंकि वे आपके भीतर स्थित ईश्वर की छवि को देखते तथा उसका सम्मान करते हैं और चाहते हैं कि आप भी उसका सम्मान करें। मैं आप से आग्रह करती हूँ कि आप गुरुदेव द्वारा सिखाये गए सत्यों को अपने जीवन में उतारें और प्रतिदिन अपनी आत्मा की उस शांति में उनके साथ समस्वर रहें जो माया की पहुँच से परे है। वहाँ आप स्पष्ट रूप से उनकी उपस्थिति तथा उनके माध्यम से प्रवाहित होती ईश्वर की शक्ति का अनुभव कर सकते हैं, जिसकी सहायता से आप क्षुद्र “अहं” की सीमाओं को त्याग कर अपने सच्चे दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं। जय गुरु!

ईश्वर एवं गुरुदेव के अनवरत आशीर्वादों सहित,

श्री श्री मृणालिनी माता

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